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Excerpt for Kalpana, Hamare Desh Ki Beti by , available in its entirety at Smashwords


कल्पना

हमारे देश की बेटी


© 2018 रबीउल इस्लाम

एडिटर श्रीकांत पांडेय





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ये कहानी लेखक की कल्पना है, नाम, पात्र, स्थान और घटनाएं लेखक की कल्पना का उत्पाद हैं, इस कहानी को काल्पनिक रूप से ही पड़ी जानी चाहिए, किसी भी वास्तविक व्यक्ति, जीवित या मृत, घटनाओं, या स्थानीय लोगों के साथ इस कहानी का कोई ताल्लुक नहीं है।


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आज हम बात करेंगे ग़रीबी की। क्या है ग़रीबी? कब आता है लोगों के जीवन में ग़रीबी?। पहले की ज़माने में भी लोगों के जीवन में ग़रीबी आया करता था, लेकिन हर वक़्त नहीं कभी-कभी। कभी बारिश नहीं होने पर खेत नहीं होते थे, तो कभी ज़्यादा बारिश होने पर खेतों में पानी भर जाते थे, जिसकी वजह से खेत नहीं होते थे। तब कुछ समय के लिए लोगों के जीवन में ग़रीबी आते थे। फिर धीरे-धीरे लोग तरक़्क़ी करने लगे, हर जगह हर खेतों में पानी की सुविधाएं होने लगे।

रही बात शहरों की, सालों पहले शहर भी इतनी तरक़्क़ी पर नहीं थे, पहले जमाने में टेक्नोलॉजी इतनी आगे नहीं थे, बड़ी-बड़ी कंपनियां नहीं थी, जिसकी वजह से लोगों को नौकरी नहीं मिलती थी। लेकिन आज है, तो फिर आज लोगों के जीवन में किस बात की ग़रीबी है? आज तो हज़ारों कंपनियों खुल गयी है, लाखों लोगों को नौकरियां मिल रहे हैं। जिन्हें यहां के कंपनियों में सैलेरी कम लग रहे हैं वो बाहर देश में जा कर नौकरी कर रहे हैं और लाखों कमा रहे हैं।


पहले जमाने में किसके घर पर हमेशा-हमेशा के लिए ग़रीबी मंडराया करता था?। जिसके घर पर कमाई करने वाला नहीं था, जिसका पति इस दुनिया से चले गए, या फिर जिसका बेटा नहीं है, उसी के जिंदगी में ग़रीबी आता था, क्योँकि उनके घर पर कमाई करने के लिए कोई नहीं होते था।

और ऐसे घर पर अगर सारे के सारे औरतें हो तो उनके घर पर कमाई कौन करेगा? कैसे चलेगा उनके घर संसार?, कब तक उस घर के औरतें संस्कृति में बंधी हुई घर पर भूखी प्यासी बैठे रहेंगे, एक न एक दिन तो उस घर की औरतों को घर से निकलना ही था, अपनी परिवार के लालन-पालन करने के लिए।

लेकिन. अपने परिवार के लालन-पालन करने के लिए जैसे-जैसे औरतें घर से निकली, उन्हें देख कर हमारे समाज में बदलाव आने लगा, और हमारी माँ-बहनों की नौकरी करने वालों की तादात बढ़ गए। कोई अपने पिताजी को दिनभर मज़दूरी करते देख नहीं पाए। किसी को अपने भाई के ख़ून-पसीने पर तरस आया, तो किसी को अपने पति का मेहनत मज़दूरी पर तरस आया।

औरत है न, माँ है न, बेटी है न, अच्छी होती है, सबकी सुनती है, सब को समझती है, खुद की दर्द छिपाती है, और दूसरों की दर्द पर महरम लगाती है, और आखिर सबका बोझ हल्का करने के लिए वो घर से निकल ही जाती है, नौकरी करने के लिए।

लेकिन जैसे-जैसे औरतें पैसे कमाने के लिए घर से निकली, वैसे-वैसे हमारे समाज के मर्द निकम्मा होने लगे।

आज बाप का थोड़ा उम्र क्या हो जाता है वो बुढ़ापे की बहाना करके घर पर ही बैठ कर खाना शुरू कर देता है, एक कहावत है न? कि जवानी में सोया और बुढ़ापे में रोया, कुछ इस तरह होते जा रहे हैं आज कल के कुछ पिताः के हालत। और घर पर अगर एक बेटा है तो वो लाढ साहब है, उसे कुछ नहीं बोलने का, बेटा ठाकुर होता है, ठाकुर साहब को कुछ बोलोगे तो महाभारत अशुद्ध हो जाएगा। कुछ इस तरह की विचारधाराओं के वजह से हमारे समाज बदलता गया।

और आज हमारे समाज से संस्कृति के सारे पन्ने छट गए, आज हमारे समाज में रह गया तो सिर्फ़ पैसा।

आज अगर कोई अपने बेटे के लिए बहु ढूंढने निकलते हैं तो वो ये नहीं पूछते हैं कि आपकी बेटी कितनी संस्कारी है, वो ये पूछते हैं कि आपकी बेटी की महीने की इनकम कितनी है। इसका मतलब ये हुआ कि वो अपने बेटे के लिए बहु नहीं पैसा कमाने वाली मशीन ढूंढ रहे हैं।

समाज के कुछ लोगों के यही विचारधाराओं के वजह से आज लोग अपने बेटियोँ को संस्कार नहीं पैसा कमाने वाली मशीन नानाने में लगे हैं, और मर्दे दिन ब दिन निकम्मा होते जा रहे हैं। इस तरह के विचारधाराओं के वजह से औरतों पर क्या-क्या बीत रहे हैं, उनके साथ क्या-क्या क्राइम हो रहे हैं, समाज के रख़्वाले को इससे कोई मतलब नहीं।


ऐसी ही सोसाइटी से ताल्लुक रखती है कल्पना, जो बचपन से ही मंदबुद्धि जैसे बीमारी का शिकार रही, हालाकि माँ ने काफि मेहनत और कई प्रकार के दवाई करवा कर काफी हद तक उन्हें ठीक कर देती है।

कल्पना की माँ पिछले बीस साल पहले घर से नौकरी करने निकली थी, लेकिन आज भी उन्हें उसका पछतावा हो रहे हैं, माँ का मानना है कि वो खुद अपने पति को अपने हाथों से निकम्मा बना दिया है, आज उन्हें अहसास हुआ कि वो अगर पैसा कमाने के घर से नहीं निकली होती, तो शायद आज उसका पति घर पर बैठ के खा-खा कर निकम्मा नहीं हो जाता। ग़रीबी आता तो वो कुछ न कुछ सोचता और मेहनत करने लगता। कल्पना का एक हट्टा-कट्टा भाई भी है तावड़े, अपने पिताजी से बड़ा अलसी और निकम्मा हो चुका है, जो आज भी अपने चड्डी खरीदने से लेकर पॉकेट मनी तक अपने माँ से ही पैसा लेता है। माँ बेचारी किसी की घर पर जूठा बर्तन धोकर कुछ पैसे कमा कर किसी तरह घर को चलाती है, पर किसी को माँ पर तरस नहीं आया, न बेटा को, न उनके पतिदेव को। लेकिन कल्पना को अपनी माँ की दुख बर्दाश्त नहीं हुआ, उसे अपनी माँ का दर्द सही नहीं गया, वो माँ का बोझ हल्का करने लिए घर से निकली, माँ का बोझ हल्का करने के लिए।







































एक



"मै आई कम इन सर" कंधे पर बैग लटकाए और हाथ में फ़ाइल लिये ऑफिस के दरवाजे़ पर खड़ी कल्पना. नॉक करते हुए मैनेजर से पूछा, लगभग चालीस से पैंतालीस साल का आधा गंजा, दांत बाहर चश्मिश मैनेजर उपाध्याय अपनी कुर्सी पर बैठे कुछ लिखते हुए एक झलक दरवाजे़ पर खड़ी कल्पना को देखा और इशारों से उन्हें अंदर आने के लिए कहा।

उपाध्याय अपने काम में व्यस्त बैठा है और कल्पना उपाध्याय के सामने आई और उपाध्याय को अपने बारे में बताने लगी,

"सर मेरा नाम कल्पना है और मैं इंटरव्यू के लिए आई हूँ" कल्पना ने कहा, उसे सुनकर अपने काम में व्यस्त बैठे उपाध्याय ने खुद को डिस्टर्ब महसूस किया, कल्पना और कुछ कहने वाली थी कि उससे पहले उपाध्याय ने कल्पना को थोड़ी देर बाद कहने का इशारा किया, और इशारों से वो कल्पना को अपनी फ़ाइल सामने टेबल पर रखने के लिए कहा।

हाथ में फ़ाइल लिए खड़ी कल्पना ने उपाध्याय के सामने टेबल पर अपना फ़ाइल रखा और उपाध्याय का काम ख़त्म होने के इंतज़ार में उसके सामने खड़ी रही।

कुछ समय बाद उपाध्याय अपना फ़ाइल के काम ख़त्म करके सारी फाइल्स को बंद करके एक साइड में रखा, और कल्पना पर गौर किया, चश्मा नीचा करके एक झलक कल्पना को ऊपर से नीचे तक उसकी गांव-खेड़े जैसी पहनी हुई लीबाज़ पर एक नज़र देखा, और सामने रखा उसकी फ़ाइल के पन्नों को पलट-पलट कर देखने लगा, तब तक कल्पना अपनी बैग से बाकी के काग़ज़पत्रों निकाल कर उपाध्याय के सामने रखी और उपाध्याय के रिप्लाई का इंतज़ार में उसके सामने खड़ी रही, उपाध्याय उन्हें देखने लगा, "अरे बैठ जाओ भाई, खड़े क्योँ हो?" उपाध्याय ने कहा, और उपाध्याय के कहने पर कल्पना, "थैंक यू सर" कहकर उसके सामने कुर्सी पर बैठ गई। उपाध्याय कल्पना के फ़ाइल के पन्नों को पलट-पलट कर देखते हुए पूछा,

"इससे पहले कहाँ थे आप?" और कल्पना ने जवाब दिया, "सर फर्स्ट टाइम है, कुछ ही दिन पहले मैंने ग्रेजुएशन पूरी की तो सोचा कि" और कल्पना की बात काट कर उपाध्याय ने कहा, "कोई बात नहीं" कहकर वो कल्पना की फ़ाइल के सारे पन्नों को पलट-पलट कर देखने लगा, उसकी सारी काग़जपत्रों को देखने के बाद मुस्कुराते हुए कहा, "आप बहुत लकी है, कल ही हमारे कंपनी में एक वेकैंसी निकला, और आज आप आ गए, आपकी जॉब कन्फर्म है, कल से आप हमारी कंपनी को ज्वाइन कर सकते हैं, शुरुवात में आपकी सैलरी तीस हजार होगी, उसके बाद आपकी एक्टिविटी देख कर कंपनी फैसला करेगी कि आपकी सैलरी कितनी बढ़ानी है" ये सुनकर कल्पना कुछ इस तरह से सांस ली जैसे वो कब से अपनी सांसों को रोक कर रखी थी, और उपाध्याय के फैसला सुनने के बाद अपनी सांसे छोड़ने लगी हो, उसकी चेहरे पर रौनक आ गया, ख़ुशी के मारे जैसे उसकी आँख भर आई, जैसे कड़ी मेहनत के बाद उसने ये नौकरी को हासिल किया, जैसे उसे इस नौकरी की सख़्त ज़रूरत थी, "थैंक यू सर" कल्पना ने कहा, और अपनी आँखों से ख़ुशी के आंसुओं को बहने से पहले ही उसने अपनी दुपट्टे की आंचल से ऐसे छुपा कर मुस्कुराई जैसे उपाध्याय को कुछ पता ही नहीं चला, लेकिन उपाध्याय को सब पता चल गया, वो कल्पना की भावनाओं को देख कर ख़ुश हुआ और मुस्कुराते हुए कहा, "बधाई हो"

"थैंक यू सो मच सर" कल्पना ने जवाब दिया,

"अरे, इसमें थैंक यू सो मच की क्या बात है भाई?, तुम इस क़ाबिल हो, तुम्हें ये नौकरी मिलना चाहिए" उपाध्याय ने कहा, और कल्पना ने भी मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "आप बहुत अच्छे इंसान है सर, भगवान ऑफिस में जॉब करने वाले हर स्टाफ को आपके जैसे मैनेजर दे, मैं भगवान से यही प्रार्थना करूंगी"

"मैडम, वो सब तो ठीक है, मगर" उपाध्याय ने कहा, और कहते-कहते रुक गया, सुनकर कल्पना थोड़ी चिंतित हुई,

"मगर क्या सर?, में कुछ समझ नहीं पाई" कल्पना ने कहा,

"आरे भाई तुम्हें इतनी अच्छी नौकरी मिल गई, हमें मिठाई कब खिला रहे हो?" मस्ती करने के अंदाज़ में कहकर उपाध्याय हंसना चाहा, और अपने चमकते दांतो को छुपाने लगा,

"कल लाऊँगी सर मिठाई, आपके लिए भी और बाकी सभी के लिए भी" कल्पना ने ख़ुश हो कर कुछ इस तरह से कहा, जैसे कल्पना अपनी घर जाने के लिए और घर जा कर अपनी नौकरी के बारे में सबको बताने को लिए बड़ी उतावली हो रही है, उपाध्याय समझ गया,

"अरे, यहां खड़ी क्योँ हो भाई? घर जाओ और हमारे मिठाई का बंदोबस्त करो" उपाध्याय ने कहा, और कल्पना अपनी सारी काग़ज़पत्रों को लपेट कर बैग में भर लिया,

"लेकिन याद रखना, सिर्फ़ आज ही के दिन तुम्हें जल्दी छोड़ रहा हूँ, कल से टाइम टू टाइम घर भेजूंगा" उपाध्याय ने फिर से मस्ती करने के अंदाज़ में कहा,

".के सर" कहकर कल्पना मुस्कुराई और उपाध्याय को बाय-बाय करती हुई वहां से निकल गई, उपाध्याय उसे जाते देखता रह गया।


दो

ख़ुशी से खिलखिलाती हुई कल्पना अपने घर पहुँची, किचन में खाना बनाती हुई माँ ने एक झलक कल्पना को देखा, कल्पना की चेहरे पर पहली बार इतनी ख़ुशी देख कर माँ अपने आप को रोक नहीं पाई, कल्पना की ख़ुशी का राज़ जानने के लिए वो किचन से बाहर कल्पना के पास आ गई, लेकिन कल्पना ने माँ को कुछ पूछने का मौक़ा ही नहीं दिया, ख़ुशी के मारे उसने माँ को गले से लगा लिया, "नौकरी मिल गई माँ, नौकरी मिल गई, आज से तुझे वो दो हज़ार रुपये की नौकरी के लिए दर-दर भटकने की कोई ज़रूरत नहीं, तू घर पर ही बैठी रहना, आज से तेरी कल्पना तुझे किसी के घर पर झाड़ू-पोछा करने का काम नहीं करने देगी, तुझे घर पर बिठा कर खिलाएगी" कल्पना ने कहा, सुनकर माँ भावुक हो गई, माँ अपनी भावनाओं में डूबने से पहले ही कल्पना अपने बैग से मिठाई का पैकेट निकाली और प्यार से अपने हाथों से माँ को मिठाई खिलाने लगी, "ले खा माँ, अब तेरी बेटी बड़ी हो गई है, और अब तो नौकरी भी हासिल कर ली है, अब तेरी बेटी किसी का बोझ नहीं बनेगी माँ, तेरा सहारा बनेगी, तेरा हर बोझ उठाएगी" सुनकर माँ की आँख भर आईं, माँ बहुत ज़्यादा भावुक हो गई, और कल्पना दीवार पर लटके गणपति बप्पा के सामने जा कर खड़ी हुई, "हे बप्पा, आज तूने मुझ पर बहुत बड़ा उपकार किया रे, तूने मुझे नौकरी दिला दी?, मैं ज़िंदगी भर तेरी ये उपकार नहीं भूलूंगी" हाथ जोड़ कर बप्पा से इतना कहने के बाद कल्पना वापस माँ के सामने आई

"माँ दादा और पापा कहां है? वो दोनों नहीं दिख रहे है, उन दोनों का भी मुँह मीठा करवाना है, कहां है वो दोनो?" कल्पना ने पूछा, दादा और पापा का नाम सुनकर माँ के चेहरे पर उन दोनों के लिए थोड़ी सी नाराज़गी जाग उठी, और उसने थोड़े गुस्से में जवाब दिया, "तू तो जानती है इस समय तेरे बाप का दारू पीने का समय होता है, और तेरे भाई का समय होता है अपने चरसी दोस्तों के साथ सुट्टा मारने का, वो दोनों अभी घर नहीं लौटने वाले हैं, दोनों निकम्मे तो अब सीधा शाम को ही घर लौटेंगे, वो भी नशे में पूरा टाइट हो कर। निकाल दे उन दोनों का मुँह मीठा करने का ख़याल अपने दिमाग़ से, तुझे उनके साथ ख़ुशियां बाटने की कोई ज़रूरत नहीं, वो दोनों तेरी ख़ुशी की कद्र नहीं करेंगे" कहकर माँ किचन की ओर चली गई, हालाकि कल्पना ने माँ की सारी बातें सुन ली है, लेकिन माँ की इन सारी बातों से कल्पना के चेहरे पर कोई असर नहीं पड़ा, वो अपनी नौकरी पाने की ख़ुशी में मगन रही।



*


रात को दस बजे के समय, माँ के साथ किचन के गेट के पास बैठी कल्पना मिठाई का पैकेट लिए पिताजी और बड़े भाई के घर लौटने की इंतज़ार कर रही थी, तभी धूल मिट्टी से लट-पटे पिताजी, फटे गंदे कपड़ों में दारू के नशे में हिलते-डुलते हुए घर पहुँचा, वो काफी गुस्से में हैं, अपना हुलिया ऐसा बना रक्खा है जैसे वो किसी के साथ मारपीट करके आये हैं और लोगों ने इन्हें बहुत मारापीटा हो। उन्हें उस हालत में देख कर माँ गुस्से में बड़बड़ करने लगी, माँ की बड़बड़ सुनकर पिताजी को गुस्सा आ गया, गुस्से में उन्होंने कहा, "तू अपना मुँह बंद करेगी? या फिर लात-जूता खाने के बाद ही शांत होगी?" ये सुनकर माँ को और ज़्यादा गुस्सा आ गया, और माँ ने गुस्से में जवाब दिया, "तू और कर भी क्या सकता है? साला निकम्मा कहीं का, जब से शादी हुई है तब से तूने मेरा जीना हराम कर रखा है!, मेरी जान खा गया!, ज़िंगगी में कभी शांति से जीने नहीं दिया!, कहीं जा कर मर क्योँ नहीं जाता है!, कम से कम मेरी जान को थोड़ा आराम तो मिलता" इतना सुनकर पिताजी को और ज़्यादा गुस्सा आ गया, और वो गुस्से में आ कर माँ के बाल पकड़ लिए, और माँ के गाल पर थप्पड़ मारने लगा ये कहते हुए, "और बड़-बड़ करेगी? बोल, और मेरे को मरने की बात करेगी? बोल, मेरे मरने की बात करती है? मैं मरने से पहले तुझे ही मार डालूँगा, आज तेरी कहानी ख़त्म ही कर डालूंगा, ज़िंगगी भर के लिए आज मैं तेरी बड़बड़ बंद कर दूंगा" कहकर पिताजी, माँ का गला दबाकर उसे जान से मारने की कोशिश करने लगे, और कल्पना आ कर किसी तरह दोनों को छुड़ाई, और माँ को एक तरफ लेकर गई उन्हें शांत करने लगी, "माँ तू चुप रहा कर ना, क्योँ इतना बड़बड़ करती रहती है?" कल्पना ने कहा, और माँ रोने लगी, "मैं पगली हूँ न, इसलिए बिना मतलब का दिन-भर बड़बड़ करती रहती हूँ, पागल कुत्ते ने काटा है मुझे" माँ ने रोते रोते कहा, लेकिन पिताजी का गुस्सा ठंडा नहीं हुआ, वो फिर से माँ को मारने के लिए गुस्से में माँ के पास जाने लगा, कल्पना ने उन्हें भी रोक लिया, और उन्हें भी शांत कराने की कोशिश करने लगी, "पापा आप प्लीज़ शांत हो जाओ न, आपको मेरी कसम, आप क्योँ छोटी-छोटी बातों को ले कर हर वक़्त माँ को मारते-डांटते रहते हैं? आपको पता है हमारे भविष्य के बारे में सोच-सोच कर माँ कितनी परेशान रहती है? दिन भर मेहनत करते-करते कितनी थक जाती है?" कल्पना ने कहा, फिर भी पिताजी का गुस्सा ठंडा नहीं हुआ, वो गुस्से में माँ को गली देना शुरु कर दिया, उनकी गालियां सुनकर माँ फिर से बड़बड़ करने लगी, दोनों का ये सिलसिला काफी देर तक जारी रहा, दोनों को शांत करते-करते कल्पना थक चुकी थी। तभी उस घर का दूसरा निकम्मा, कल्पना का बड़ा भाई तावड़े हिलते-डुलते हुए घर पर हाज़िर हो गया, वो भी नशे में टुन्न, उसे नशे में हिलते-डुलते आते देख कर पिताजी को और ज़्यादा गुस्सा आ गया, गुस्से में उन्होंने तावड़े से पूछा, "किधर से आ रहा है बे तू? और तेरी ये हिम्मत? कि तू बाप के सामने दारू पी कर आया, हरामख़ोर" पिताजी ने कहा, पिताजी के ज़ुबान से इस तरह का भाषा सुनकर तावड़े को गुस्सा आ गया, और वो पिताजी को उल्टा जवाब देते हुए कहा, "तू मेरा बाप है तो क्या मैं तेरे सामने दारू पी कर नहीं आ सकता हूँ?" ये सुनकर पिताजी गुस्से में लाल हो गया, "साला इसीलिए मैं तेरी शादी नहीं करवाया!, कमाई एक फूटी कौड़ी की नहीं और बातें बड़ी-बड़ी, वो भइये लोगों का कहावत है ना? कि ज़िंगगी झंड बा फिर भी घमंड बा, वैसी तेरी हालत है बेटा, समझा" पिताजी ने गुस्से में कहा,

"तो तू कौन सा मेरे लिए बंगला बनाकर रक्खा है?" तावड़े ने गुस्से में कहा, ये सुनकर पिताजी को और ज़्यादा गुस्सा आ गागा,

"साला, तू बाप के साथ ज़ुबान लड़ाता है? तेरी माँ की" कहते-कहते पिताजी गुस्से में तावड़े के क़रीब चला आया, और तावड़े को पकड़ कर उसे मारने लगा, कल्पना और माँ आ कर बाप-बेटे को दोनों को छुड़ाने लगे, लेकिन छुड़ा नहीं पाये, तावड़े ने भी कसकर अपने बाप का कॉलर पकड़ लिया, "देख पापा, तेरे को समझा रहा हूँ, छोड़ दे वरना समझ ले" कहते-कहते तावड़े भी पिताजी को थप्पड़ पे थप्पड़ मारने लगा! तब तक किसी तरह कल्पना और माँ दोनों को छुड़ा कर एक दूसरे से अलग किया, पिताजी गुस्से में कहा, "मादर चोद!, बाप पर हाथ उठाता है?! आज तू गया काम से!" कहते हुए वो तावड़े के तरफ आने लगा, तावड़े भी पिताजी को मारने के लिए गुस्से में उछलने लगा, पिताजी की तरफ आने लगा ये कहते हुए, "बहुत बर्दाश्त कर लिया मैं तेरा नाटक, अब बर्दाश्त नहीं करूँगा, आज तुझे मार ही डालूंगा, तुझ जैसे बाप को मार कर जेल जाने से कोई पाप नहीं होता है" लेकिन कल्पना ने पापा को, और माँ ने तावड़े को कस कर पकड़ लिया है, दोनों ने उन दोनों को आगे नहीं बढ़ने दिया, पिताजी ने गुस्से में तावड़े से कहा, "आज मुझे अपनी ग़लती का अहसास हुआ, तुझे पैदा करके मैंने अपनी ज़िंदगी में सबसे बड़ी ग़लती की!, अगर मुझे पता होता बड़ा हो कर तू इतना बड़ा हरामखोर निकलेगा!, तो में कभी तुझे पैदा नहीं करता, तेरे जैसे बेटा पैदा करने से अच्छा मैं कल्पना जैसी एक और बेटी पैदा करता, साला बेटी ही अच्छा है"

"ओह हो, ज़िंगगी भर बैठ कर औरत की कमाई खा-खा कर मन नहीं भरा है तेरा, इसके लिए अब जवान बेटी को दर-दर भटकने के लिए भेज दिया, जाओ पैसा कमाकर लाओ और निकम्मा बाप का पेट पालो, और अब ख़याल आया कि बेटा तो हारामख़ोर निकला, तो ऐसे बेटे से अच्छा एक और बेटी रहता तो और अच्छा होता, दो-दो बेटियों की कमाई पर ज़िंगगी का भरपूर आनंद मिलता। ज़िंगगी भर औरतों की कमाई खा कर ज़िंदा रहने का इरादा है क्या तेरा?, बेटा बड़ा हो गया है, बेटे के लिए घर बनाना है, बेटी बड़ी हो गई है उसकी शादी करवाना है, ये सब ख़यालात बाप के दिमाग़ में नहीं आता है क्या?" ये सुनकर माँ तावड़े पर भड़क गई, "कोई किसी की शादी नहीं कराएगा, न ही कोई किसी के लिए घर बनवाएगा, अब सब बड़े हो गए, इतने बड़े हो गए कि अब माँ-बाप तुम लोगों के सामने कुछ नहीं है, जब इतने बड़े हो गए हो? तो सब अपने-अपने दुनिया देखो" माँ ने कहा,

तब तक पिताजी अपनी बदतमीज़ी भाषे से तावड़े को गाली देना शुरु कर दिया!, तो तावड़े ने भी पिताजी को गंदी-गंदी गाली देने लगा! और माँ तावड़े को खींचते हुए उसे पिताजी की नज़रों से दूर लेके जाने की कोशिश करने लगी, लेकिन तावड़े को एक कदम भी जगह से हिला नहीं पाई, उल्टा तावड़े माँ पर भड़क गया, "सब तुम्हारी वजह से हो रहा है, बिठा के खिला-खिला कर निकम्मा कर दिया तुमने इसको, और अब इसका पेट पालने के लिए तुमने अपनी जवान बेटी को भी नहीं छोड़ा, भेज दिया दर-दर भटकने के लिए, दूसरों गुलामी करवाने के लिए" तावड़े ने गुस्से में कहा,

"तो तू कौनसा पहाड़ तोड़ कर घर लौटता है?, तू भी तो उसी खेत की मूली है" माँ ने गुस्से में कहा,

"आरे कम से कम अपनी जेब ख़र्च के लिए तेरे से पैसा तो नहीं मांगता हूँ न" तावड़े ने कहा,

"मांगने से भी तुझे नहीं मिलेगा" माँ ने कहा,

"क्योँ? सारे दंड मुझे ही मिलेगा?" तावड़े ने कहा,

"नहीं, अब मैंने सबको पैसा देना बंद कर दिया"

"हा हा, इधर तू पैसा देना बंद कर दिया, और उधर पिताजी तेरा दस लाख का दुकान दो लाख में बेच कर दारू पी गया" तावड़े ने कहा, सुनकर माँ और कल्पना आश्चर्य हो गई,

"कौन सी दुकान की बात कर रहा है रे तू?" माँ ने पूछा,

"तू धीरूभाई अंबानी की एकलौती बहन नहीं है, तेरी एक ही दुकान था, जो चलता नहीं था और तूने उसे बंद रखा था, मैं उसी दुकान की बात कर रहा हूँ, जिसपर हम सभी की उम्मीदें टिकी थी" तावड़े ने कहा, सुनकर माँ ख़ामोश हो गई, उसकी निराश आँखें पिताजी पर जा कर रुकी,

"किसी का बाप का नहीं थी, वो मेरा प्रोपर्टी थी" पिताजी ने गुस्से में अपना सफाई देते हुए कहा, सुनकर माँ अपने आपको संभाल नहीं पाई, वो रोने लगी, रोते-रोते ज़मीन पर लेट गई और लेटे ऐसे गिड़गिड़ाती हुई रोने लगी जैसे तावड़े ने उन्हें किसी की मरने के ख़बर सुना दिया हो, माँ का रोना देख कर कल्पना अपने आपको संभाल नहीं पाई उसकी भी आँख भर आईं, वो माँ के पास आ कर माँ के आंसू पोंछने लगी, माँ को संभालने लगी,

"देख पापा, मैं बहुत बर्दाश्त कर लिया, मेरे उम्र से छोटे-छोटे लड़का लड़कियों की शादी हो गई है, और मैं, सिर्फ़ अपनी जवान बहन की शक्ल देख कर अब तक चुप रहा हूँ, पर तू ये बात नहीं समझा, लेकिन अब समझेगा, अब अगर पैसे के बिना तमन्ना की शादी मेरे अलावा किसी और से हो गया न? तो समझ लेना, गर्दन काट लूंगा तेरा" तावड़े गुस्से में पिताजी को अंगुली दिखा कर कहा, और घर से निकल गया। माँ नीचे ज़मीन पर लेटी रो रही है, कल्पना उन्हें संभाल रही है, ये सब देख कर भी पिताजी को कुछ फ़र्क नहीं पड़ा, जैसे उस घर पर ये सब हर रोज़ का तमाशा हो। तावड़े के जाने के बाद पिताजी तावड़े को गाली बकते हुए वहीं पर अपने खटिये पर लेट गया, लेटे-लेटे बड़बड़ करता रहा।


*


सुबह के दस बजे के समय, कल्पना सज धजकर ऑफिस के लिए घर से निकलने लगी तो उसकी नज़र घर के कोने में अकेली गुमसुम सी बैठी माँ पर पड़ी, ये देख कर कल्पना माँ के पास गई, माँ की आँखों से आंसू बह रहे है, "माँ तू रो रही है?" कल्पना ने कहा, और अपनी दुपट्टे के आंचल से माँ की आंसू पोंछ दिया, माँ थोड़ी नाराज़गी से कल्पना को देखने लगी, "तो क्या करूँ? सबकुछ बर्बाद होने के बाद हंसू क्या?" माँ ने कहा, और कल्पना हां में सिर हिलाई और मुस्कुराई, माँ कल्पना को देखती रही,

"नहीं हंसने का है मुझे, चल जा यहां से" माँ ने कहा और कल्पना से मुँह फेर लिया, तो कल्पना माँ को हंसाने के लिए उन्हें गुदगुदी करने लगी,

"अरे अरे, क्या कर रही है? पगली है क्या? छोड़ मुझे छोड़" कहते-कहते कल्पना की गुदगुदी से माँ को हंसी आ गयी, माँ की हंसी देख कर कल्पना भी हंसने लगी, कुछ पल माँ-बेटी दोनों हंसने के बाद, माँ फिर से भावुक हो गई, उसकी आँखों में आंसू आ गये।

"एक तू, और एक मैं, सबके लिए मर रहे हैं, लेकिन किसी को हमारी परवाह ही नहीं, कैसे होगा ये सब?" माँ ने भावुक भाव से कहा,

"सब कुछ होगा माँ, हम दोनों मिलकर फिर से सब ठीक कर देंगे, बस तू मेरा साथ दे, तू रोना बंद कर दे, तुझे रोते हुए देखती हूँ तो अपने आप को संभाल नहीं पाती हूँ, अंदर से टूट-टूट कर बिखर जाती हूँ माँ" कल्पना ने भावुक हो कर कहा, कहते-कहते उसकी आँखों में भी आंसू आ गए, ये देख कर माँ प्यार से उसे डांटने लगी, "ये, तू क्योँ रो रही है?, आज तेरा ऑफिस का पहला दिन है ना, ऐसा रोता हुआ चेहरा ले कर ऑफिस जाएगी क्या?" कहकर माँ ने कल्पना के आंसू पोंछे।, और एक टक कल्पना को मुस्कराकर देखा, माँ का मुस्कुराता चेहरा देख कर कल्पना ख़ुश हो गई,

"जा, ऑफिस जा, और मुस्कुराता हुआ जा, ऐसे रोते हुए मत जा" माँ ने कहा, कल्पना हां में सिर हिलाई और माँ को बाय बाय करती हुई ऑफिस के लिए घर से निकलने लगी,

"अपना ख़्याल रखना" माँ ने कहा,

"यस माँम" कहकर कल्पना चली गई, माँ उसे जाते देखती रह गई।



तीन


ऑफिस का पहला दिन कल्पना का बहुत अच्छी तरह से गुज़रा, ऑफिस में कल्पना की शुष्म नाम की एक बहुत अच्छी लड़की से मुलाक़ात हुई, जिसने उस ऑफिस में जॉब करने वाले खास कर सीनियर स्टाफ करण और राकेश से कल्पना को मिलाया। मैनेजर के बाद उस ऑफिस में सभी लोग करण और राकेश को ही पूछते हैं। उन दोनों से मिलकर कल्पना को अच्छा लगा, वो दोनों अच्छे लड़के है। दोनों से मिलाने के बाद शुष्म ने कल्पना को बाकी सभी से भी परिचय करवाया।

शुष्म ने कल्पना को उसका काम समझाने में भी उसकी पूरी सहायता किया।

वो ऑफिस एक बहुत बड़ा एजेंट का ऑफिस है, उस ऑफिस में तरह-तरह के जॉब के लिए स्टाफ लोगों का इंटरव्यू लिया जाता है, और सलेक्ट करके उन्हें बाहर देश में नौकरी के लिए भेजा जाता है, सिर्फ़ बाहर देश ही नहीं बल्कि एयरपोर्ट और बड़ी-बड़ी कंपनियों में भी वहीं से स्टाफ सप्लाई किया जाता है। ये सब कुछ समझाने के बाद शुष्म ने कल्पना को उस ऑफिस के सभी रूल्स समझाए, शुष्म ने कल्पना को ये भी समझा दिया कि किसके साथ किस तरह से रहना है, किसके साथ कब और किस तरह से बर्ताव करना है, उसके समझाने के मुताबिक कल्पना ने उसकी सारी बातें अपनी दिमाग़ में बिठा लिया।

कल्पना को शुष्म और अपनी नौकरी दोनों ही घर जैसे लगा, ऑफिस का पहला दिन इतना अच्छा गुज़रा कि उसे पता ही नहीं चला कब शाम हो गयी, उसे ये अहसास ही नहीं हुआ कि वो नौकरी कर रही है।


ऑफिस का दूसरा दिन उस ऑफिस का बॉस ऑफिस आया, बॉस उम्र से बॉस नहीं वो एक छब्बीस-सत्ताईस साल का लड़का है। ऑफिस में उसके दाख़िल होते ही उसके आसपास से गुज़रते हुए सभी स्टाफ ने उन्हें गुड मॉर्निंग बॉस कहकर विश किया, बॉस ने भी प्यार से उन सभी को गुड मॉर्निंग का जवाब वेरी गुड मॉर्निंग से दिया। एक स्टाफ ने सिर्फ "गुड मॉर्निंग" कहा, गुड मॉर्निंग बॉस नहीं कहा, और बॉस ने उसे ये जवाब दिया, "मुझे बॉस कहने के लिए अगर शरम लग रहा है तो बता दो?" वो स्टाफ सॉरी बॉस कहकर साइड में चला गया। सभी स्टाफ के बीच बैठी कंप्यूटर ऑपरेट करती हुई कल्पना ने बॉस पर गौर नहीं किया, लेकिन बॉस ने कल्पना पर गौर किया, अपनी ऑफिस में नई लड़की कल्पना को देख कर, बॉस की नज़र कल्पना पर ठहर गयी, वो कुछ पल कल्पना को देखता रहा, कल्पना भी एक झलक उन्हें देखा, तो बॉस ने उसे देख कर मुस्कुराया, कल्पना ने भी मुस्कुराई और बॉस ख़ुश हो कर अपने केबिन में चले गए। पास में बैठी शुष्म से कल्पना ने उसके बारे में पूछा, तो शुष्म ने जवाब दिया, "ये हमारे नए बॉस है"

"नए बॉस है मतलब?"

"एक महीना हुआ इन्हें हमारे बॉस बनकर"

"मैं कुछ समझी नहीं"

"तू भी अभी नई है, इसलिए अपने दिमाग़ में ज़्यादा ज़ोर मत दाल, जैसे-जैसे पुरानी होती जाएगी वैसे-वैसे सब पता चल जाएगा" शुष्म ने कहा, इस बात पर कल्पना अपने दिमाग़ में ज़्यादा ज़ोर नहीं डाला, वो अपने काम में व्यस्त हो गयी।


शाम के वक़्त अपनी घर जाने के लिए कल्पना ऑफिस से छूटकर शुष्म के साथ ऑफिस से बाहर निकली। दोनों एक दूसरे से बातचीत करते हुए पैदल चलती हुई जाने लगी, ऑफिस से थोड़ी दूर जा पहुँची कि तभी बॉस कार में उसी रास्ते से जाते हुए उन दोनों को पैदल चलते देख कर हॉर्न बजाया, दोनों ने पीछे मुड़कर देखा, हमारा बॉस है, ड्राइव करते हुए बॉस ने दोनों के करीब आ कर कार रोकी और कार का गेट खोल कर दोनों को कार में बैठने के लिए इशारा किया, शुष्म ख़ुशी-ख़ुशी बॉस के कार में बैठ गई, लेकिन कल्पना मना कर रही है, वो बॉस की कार पर में बैठने के लिए तैयार नहीं, तो शुष्म ने पूछा,

"क्या हुआ?"

"कुछ नहीं तू जा, मैं चली जाऊँगी" कल्पना ने कहा,

"चल न, क्योँ शरमा रही है? कोई बाहर का आदमी थोड़ी है, हमारा अपना बॉस है, जाते-जाते हमें घर तक छोड़ देंगे, इतना क्योँ टेंशन ले रही है तू" शुष्म ने कहा, फिर भी कल्पना बॉस की कार में नहीं बैठ रही थी, तो शुष्म ने कल्पना का हाथ पकड़ कर ज़बरदस्ती उसे कार में बिठाया और बॉस ड्राइव करने लगा।

रोड पर चलते कार के अंदर बॉस के साथ बैठी शुष्म ने बॉस को कल्पना से परिचय करवाया कहा, "बॉस, ये कल्पना है, हमारे ऑफिस में नई है, इसीलिए आपकी कार में बैठने के लिए शरमा रही थी" शुष्म ने मस्ती करने के अंदाज़ में कहा,

"मुझे अपना बॉस मत समझो, अपना दोस्त समझो, शुष्म की तरह" कहकर ड्राइव करते हुए बॉस शुष्म के साथ मस्ती करने लगा, ऐसे जैसे दोनों बॉयफ्रैंड-गर्लफ्रैंड हो, कल्पना देखती रह गई।


उसके दूसरे दिन बॉस जल्दी ऑफिस आया, और कल्पना को देख कर मुस्कुराते हुए अपने केबिन में चला गया, कंप्यूटर ऑपरेट करती हुई कल्पना भी बॉस को देख कर मुस्कुराई, फिर उसने अपने मन में सोचा कि किसी को देख कर ज़्यादा मुस्कुराना अच्छी बात नहीं, सोच कर वो वापस अपने काम में व्यस्त हो गई।

बॉस के केबिन के अंदर जाने के कुछ देर बाद ऑफिस बॉय कल्पना के पास आया और कल्पना से कहा, "बॉस ने आपको अपने केबिन में बुलाया है" सुन कर कल्पना थोड़ी सी चिंतित हुई, और बॉस के केबिन में पहुँची,

"कल्पना, आओ, बैठो" बॉस ने कहा, और कल्पना बॉस के सामने कुर्सी पर बैठ गई, कुछ पल बॉस कल्पना को देख कर मुस्कुराता रहा कल्पना भी मुस्कुराती रही, फिर अपनी कुर्सी से उठ कर बॉस कल्पना के करीब आया उसकी बाजूवाली कुर्सी पर उसके बाजू में बैठ गया, कल्पना थोड़ी सी घबरा गई,

"कहां रहती हो?" बॉस ने पूछा,

"सर, यहीं पास ही कॉलोनी में रहती हूँ" कल्पना ने जवाब दिया,

बॉस कल्पना के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, "माँ-बाप के साथ?, या फिर, किसी और के साथ?"

"अपनी परिवार के साथ" कल्पना ने कहा,

"कोई बॉयफ्रैंड है?" बॉस ने पूछा, ये सुनकर कल्पना कुछ पल के लिए हैरत सी हो गई,

"नहीं" कल्पना ने जवाब दिया,

कल्पना के कंधे पर हाथ रखे हुए बॉस धीरे-धीरे कल्पना के बदन पर हाथ फिराने लगा और कहा, "मुझे समझ नहीं आता है, इस उम्र में भी बिना बॉयफ्रैंड के कैसे रह पाती हो तुम लड़कियां?" बॉस ने कहा, कल्पना के बदन पर उस तरह से हाथ लगाना और उस तरह बॉस का कल्पना से बेहूदा बातचीत करने से कल्पना को बॉस पर थोड़ा सा गुस्सा आ गया, उसने बॉस का हाथ अपने बदन से हटाते हुए कहा, "सर, मैं वैसी लड़की नहीं हूँ, जैसे आप सोच रहे है" कल्पना का जवाब और उस तरह से बॉस का हाथ अपने बदन से हटाने से बॉस थोड़ा सा नर्बस हुआ, कहा, "कल्पना, तुम बहुत भोली हो" बॉस ने कहा,

"सर में ऐसी ही हूँ"

"और बहुत ख़ूबसूरत भी"

"थैंक यू सर"

बॉस कल्पना को समझाने के अंदाज़ में कहने लगा, "कल्पना, थोड़ी सी समय की कद्र करना सीखो, ये समय तुम्हारे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है, इस समय तुम अगर थोड़ा सा दिमाग़ का इस्तेमाल करती तो लाखों रुपया कमा सकती थी" कहकर बॉस फिर से कल्पना के बदन पर हाथ फिराने लगा और कहा, "कभी पैसे-वैसे की कोई कमी हो तो मुझे बता देना?, तुम्हें मना थोड़ी ना करूँगा मैं"

कल्पना फिर से बॉस का हाथ अपने बदन दे हटा दिया और थोड़ा गर्म मिज़ाज से जवाब दिया, "सर आप अपने पैसे अपने पास रखिये, और मुझे अपने हाल में छोड़ दीजिये, मैं जैसी भी हूँ बहुत ख़ुश हूँ, इससे अगर आप मुझे नौकरी से निकालना भी चाहते है तो कोई बात नहीं, मैं ख़ुशी-ख़ुशी चली जाऊंगी, लेकिन मैं किसी का इस तरह का बर्ताव बर्दाश्त नहीं करूंगी" कहकर कल्पना बॉस के केबिन से बाहर चली गई, उसके जाने के बाद बॉस कुछ देर तक सोचता रह गया, फिर अकेले-अकेले मुस्कुराने लगा, "मेरे ऑफिस में नौकरी करने वाली एक मामूली सी लड़की के अंदर अगर इतना एट्टीट्यूड हो सकता है, तो मुझ जैसे करोड़पति के अंदर कितना एट्टीट्यूड होना चाहिए?" बॉस ने खुद से कहा,



चार


शाम के वक़्त थकी हारी कल्पना घर पहुँची, और किचन के अंदर जा कर अपने बिस्तर पर सुकून की सांस लेती हुई बैठ गई कि तभी माँ एक प्लेट में काफ़ी सारे खाने की चीज़ें और फ़ल-फ्रूट लेकर मुस्कुराते हुए कल्पना के पास आई, ये देख कर कल्पना आश्चर्यजनक हो गई, "ये सब क्या है माँ? और किसके लिए है ये सब?" और माँ प्यार से कल्पना को वो सब कुछ खिलाने लगी, "ले खा बेटी, सब तेरे लिए है" प्यार से कल्पना को खिलाते हुए माँ ने कहा, कल्पना आश्चर्य हो कर माँ को देखती रह गई,

"ये तू क्या कर रही है माँ?" कल्पना ने जवाब दिया,

"मैं ख़ुश हूँ, तुझे प्यार से खिलाने का मन किया, क्योँ, प्यार से अपनी बेटी को खिला नहीं सकती हूँ क्या?" कहकर माँ मुस्कुराई,

"खिला, सकती, हो, मेरा मतलब तुम्हें मेरे लिए इतना मेहनत से ये सारी चीज़ें बनाने और इतने सारे महँगा-महँगा फ़ल-फ्रूट ख़रीद कर लाने की क्या ज़रूरत थी, तेरे हाथों से बनाई हुई रोटी-सब्ज़ी रोज़ खाती हूँ ना, मेरे लिए उतना बस हो गया, मैं उसी में तुमसे बहुत ख़ुश हूँ माँ" कल्पना ने जवाब दिया, ये सुनकर माँ और ज़्यादा ख़ुश हो गई,

"अच्छा ठीक है, अब तू अपनी मीठी-मीठी बातों से माँ को मस्का मारना बंद कर, और ये बता तेरा काम-धाम कैसा चल रहा है?, सब कुछ ठीक चल रहा है ना?" माँ ने मुस्कुराते हुए पूछा, इससे कल्पना को थोड़ी सी हड़बड़ाहट हुई, हड़बड़ा कर माँ को जवाब दिया, "हां माँ, बहुत अच्छा नौकरी है, सब लोग भी बहुत अच्छे हैं, उस ऑफिस में नौकरों को बड़े प्यार से रखते हैं, और तुझे पता है? उस ऑफिस में शुष्म नाम की एक बहुत अच्छी लड़की है, वो मेरी बहुत मदद करती है, मेरा ख़याल भी रखती है" कल्पना की ये सारी बातें सुनकर माँ अपनी भावनाओं में डूबने लगी, जैसे वो फूट-फूटकर रोने लगेगी,

"अब क्या हुआ माँ?, तू क्योँ इतनी टेंशन ले रही है?" कल्पना ने पूछा,

"तू नहीं समझेगी पगली, एक जवान बेटी जब काम करने के लिए घर से निकलती है तो माँ की दिल पर क्या बीतती है, तुझे नौकरी पर भेजने का मेरा थोड़ा भी मन नहीं है" माँ ने भावुक हो कर कहा,

"अरे इसमे इतना टेंशन लेने की क्या बात है, मैं अकेली थोड़ी ना काम पर जा रही हूँ, और लड़कियां भी तो जा रही है" कल्पना ने जवाब दिया,

"ये, तू झूठ मत बोल हः, मैं सब जानती हूँ, कौनसी लड़कियां काम पर जाती है, सब तेरे जैसे लड़कियां काम पर जाती है। जिस भाई को अपनी बहन का पेट बोझ लगने लगता है ना उसी की बहन मजबूरी में अपनी पेट पालने के लिए घर से निकलती है। जो बाप बच्चे पैदा करके लावारिस की तरह अपने बीवी बच्चों को अपने हाल में छोड़ देते हैं, जिनके घर के सारे मर्द निकम्मा हो जेते हैं अक्सर उन्ही के घरों में ग़रीबी आती है, और अपनी ग़रीबी से जंग लड़ने के लिए उनकी बहु बेटियां पैसा कमाने के लिए घर से निकलती है। तुझे क्या लगता है मुझे कुछ पता नहीं?, मुझे सब पता है, मैं सब जानती हूँ, और सब देखती भी हूँ। अपने पड़ोस वाले तेरा श्याम अंकल के घर जा कर देख, उनकी तो चार चार बेटियां हैं, फिर भी कैसे पलकों पे बिठाकर रखते हैं अपने बेटियों को, हर त्यौहार पर बेटियों के लिए नए-नए कपड़े, नए-नए तेल साबुन, कितना ख़र्च करता है अपने बेटियों पर, फिर भी उनके पास कभी किसी चीज़ की कमी नहीं होती है, और उसकी बेटियां पैसे कमाने के लिए घर से भी नहीं निकलती हैं। और तेरा बिटटू दादा को देख ले, उस बेचारे का तो बचपन में ही बाप मर गया था, उसके घर पर जा कर देख, कैसे रखा है अपने माँ और अपने इकलौती बहन को, कहता है माँ भगवान का दूसरा रूप है, माँ नाराज़ हो जाएगी तो भगवान भी नाराज़ हो जाएगा, और बहन को तो जैसे मेहमान की तरह अपनी पलकों में बिठा कर रखते हैं, नौकरी पर भेजना तो दूर की बात, बहन को घर का काम भी नहीं करने देता है, कहता है बहन तो चार दिन के लिए मेरे घर में मेहमान बनकर आई है, शादी हो कर अपने ससुराल चली जाएगी तो कहां बहन का प्यार नसीब होगा, बहन को वो जितना प्यार करता है उतना तो वो अपने आप से नहीं करता है, कहता है बहन का प्यार नसीब वालों को मिलता है, जिसकी बहन नहीं है उसका नसीब ही ख़राब है ऐसा कहता है तेरा बिटटू दादा। मैं तो ये देख कर हैरान हूँ कि बिटटू इतना जल्दी कैसा इतना समझदार इतना पारिवारिक हो गया, वो तो तावड़े से भी पांच साल का छोटा है, बड़ों से कितनी इज़्ज़त से बातचीत करता है, माँ की कितना सेवा करता है, बहन का कितना ख़याल रखता है, बहन का हुकुम सर-आँखों पे रखता है, हर ख़ुशियां बहन के कदमों पे ला कर लुटाता है।

ऐसा ही होना चाहिए, हर माँ बाप का सपना होता है कि मेरा बेटा बड़ा हो कर समझदार बने, सबके बारे में सोचे और सबका ख़याल रखें। हर लड़की भी यही चाहती है कि मैं बड़ी हो कर एक माँ की तरह अपने भाई और बाप को प्यार दूँ, उनकी सेवा करूँ और बच्चे जैसे ज़िद करू, और मेरे बाप और मेरे भाई मुझे छोटे बच्चों की तरह प्यार करे मेरी हर ज़िद पूरी करें" कहते-कहते माँ अपनी भावनाओं में डूब गई, "लेकिन तेरे नसीब में तेरा बाप और तेरा भाई का प्यार नहीं है बेटा, तेरी ज़िद पूरी करना तो दूर की बात, तेरे बाप-भाई ने तो उल्टा तुझे रोड पर लेकर आ गए, तुझे लावारिस बना दिया" कहते-कहते माँ की आँखों में आंसू आ गए, माँ की आँखों में आंसू देख कर कल्पना की आँखें भर आई, माँ की आँखों से आंसू पोंछकर कल्पना ने माँ को सीने से लगा लिया और अपने आंसू छुपाने लगी, माँ और ज़्यादा अपनी भावनाओं में डूब गई, उसकी आँखों से झरझर आंसू बहने लगे, अपने आप को रोक नहीं पाई वो रोने लगी,

"तुझे समझने वाले, तेरी करने वाला कोई नहीं है" माँ ने रोते-रोते कहा,

"ऐसा क्योँ कहती है माँ, तू है ना मेरी फिक्र करने वाली, बस हो गया, और क्या चाहिए" भावुक भाव से कल्पना ने कहा,

"तुझे ही माँ-बाप की तरह सबकी फिक्र करना पड़ रही है, सबके पेट पालने के लिए तुझे ही दर-दर भटकना पड़ रहा है, अब तो तू ही सबकी माई बाप है बेटा, तू नहीं होती तो हम सभी को भूखे मरने की नौबत आ जाती" माँ ने कहा,

और कल्पना माँ को इस तरह शांत करने लगी जैसे बच्चा रोता है और माँ बच्चे को गोद मे लिए उन्हें शांत करते हैं,

"तू रो मत माँ, अपनी आंसू पोछ ले, ये तेरे रोने का समय नहीं है, हंसने-खेलने का समय है, तेरी बेटी बड़ी हो गई है ना, तुझे रोने नहीं देगी, तेरा हर दर्द झेलेगी, तेरे हर गम पी लेगी, " माँ को शांत कराते हुए कल्पना ने कहा,

"बेटा, आज एक विनती करनी थी तुझसे?" माँ ने कहा,

"विनती नहीं माँ, तू सिर्फ़ हुकुम कर, क्या करना है मुझे तेरे लिए?" कल्पना ने कहा,

"तेरा सारा पैसा जमा करके सबसे पहले तू अपने बड़े भाई तावड़े को एक छोटी सी कुटिया बना कर दे, और उस लड़की से उसकी शादी करा दे जिसके साथ वो अपना वक़्त बर्बाद कर रहा है, उसकी शादी हो जाएगी तो हो सकता है शादी के बाद वो लड़की तेरी तरह नौकरी करके तेरे भाई का पेट पाल ले, नहीं तो वो भूखा मर जाएगा, एक दिन हमारी तरह उसकी बीवी बच्चों का भविष्य हो जाएगा, आपाने बाप की तरह आलसी है न, निकम्मा है न, अपना पेट नहीं पाल पायेगा, यही विनती करनी थी आज तुमसे" इतना कहकर माँ फिर से रोने लगी,

"तू थोड़ा भी फिक्र मत कर माँ, सब होगा, सिर्फ़ यूहीं तू मेरा साथ देता रह, और रोना बंद कर दे, दुनिया की हर जंग जीत जीती हूँ मैं, बस तेरे आंसुओं के सामने हार जाती हूँ, तेरे आंसू बर्दाश्त नहीं कर पाती हूँ मैं, तेरा रोता हुआ चेहरा मुझे तिल-तिल मारती है माँ" ख़ुद के आंसू छुपाती हुई कल्पना ने कहा, और माँ के आंसू पोछने लगी, "बहुत रोई तू अपनी ज़िंदगी में, अब थोड़ा सा आराम भी कर ले तू, अपनी बेटी की गोद में" कल्पना ने कहा,

कल्पना की इस तरह की इमोशनल भरी बातें सुन-सुन कर माँ और ज़्यादा रोई, इतनी रोई कि रो रो कर उन्होंने अपने दिल का बोझ हल्का कर लिया, और कब उन्हें नींद आ गयी उन्हें पता भी नहीं चला, वो कल्पना की गोद में सिर रख कर सो गई, और जैसे माँ बच्चे को गोद में सुलाये रखती हैं उसी तरह कल्पना माँ को अपनी गोद में सुलाये भावुक हो कर बैठी रही।



दूसरा दिन सुबह-सुबह माँ खाना बना कर, कल्पना के लिए एक टिफ़िन में खाना पैक किया, और कल्पना के बैग में वो टिफ़िन रखा, कल्पना ऑफिस जाने के लिए साज धाजकर कमरे से बाहर आई, वो बैग अपने कंधे पर लटकाई और माँ को बाय-बाय करती हुई ऑफिस के लिए घर से निकल गई, माँ खड़ी-खड़ी कुछ पल कल्पना को जाते देखती रह गई, कल्पना के जाने के बाद वो घर की साफ सफाई में जूट गई, घर की जूठे बर्तनों में व्यस्त हो गई।


पाँच



ऑफिस पहुँच कर कल्पना ने सब से हेलो-हाय की, और कंप्यूटर के सामने कुर्सी पर बैठ कर अपने काम में व्यस्त हो गई। थोड़ी देर बाद बॉस ऑफिस आया, वो कंप्यूटर ऑपरेट करती हुई कल्पना को थोड़ी गुस्से में एक नज़र देखते हुए अपने केबिन के अंदर चला गया, कल्पना ने भी बॉस को एक झलक देखा कि बॉस मुझे घूरते हुये चला गया, कल्पना समझ गई कि कल जो हमारे बीच हुआ उसके लिये वो मुझे घूर रहा है, लेकिन इस बात पर कल्पना ने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया, वो अपनी काम में मग्न रही।

थोड़ी देर बाद, बॉस गुस्स में केबिन से बाहर आया और छोटी-छोटी चीजों को लेकर कल्पना को दिखा-दिखा कर, सबको डांटने-फटकारने लगा, यहां तक के मैनेजर को भी उन्होंने कुछ ही समय में दर्रा कर रख दिया, ये देख कर कल्पना थोड़ी सी आश्चर्यजनक जनक हो गई, वो घबरा गई, उसके मन में काफी सारे ख़यालात चलने लगी, "हे भगवान, कैसे पागलों के बीच मेरी नौकरी लगी" मन ही मन कल्पना ने कहा, और उसने अपने मन में ये ठान लिया कि, "अब मुझे इस नौकरी को त्यागना है, और कल से कोई दूसरी नौकरी की तलाश करना है" ठीक कल्पना की तरह उस ऑफिस में नौकरी करने वाले जो नए स्टाफ थे, जिन्हें बॉस के इस तरह की हरकतें पसंद नहीं थी, वो लोग थोड़ी देर बाद मैनेजर के केबिन में गए, मैनेजर को "थैंक यू" कहा, और अपनी-अपनी टाई उतार कर मैनेजर के हाथ में रख कर जॉब छोड़ कर तुरंत ऑफिस से निकल गए, मैनेजर उन्हें देखते रह गया।


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